Tuesday, June 27, 2006

मैं भी रोना चाहता हूँ

वन्दना मेरी है तुमसे,
मेरे पथ को मोड़ दो।
वर्षों का सेवक मै तेरा,
अब ये बन्धन तोड़ दो।

राह चलते चलते तेरी,
अब मैं हो चुका हूँ चूर।
थक गया हूँ, ढेर हूँ मैं
अभिलाषा मेरी एक 'क्रूर'।

दे दे बस एक पल की मुक्ती,
दे दे बस एक पल का चैंन।
बेचैन, अदभुत उन क्षणो की
राह देखे हैं ये नैंन।

तेरे सफ़ल मंत्रो से अब मैं,
'स्वातंत्र विफ़लता' चाहता हूँ।
तेरी लकीर पर उगते सूर्य की
'स्वर्णिम ढलता' चाहता हूँ।

चाहता हूँ, प्रयास विफ़ल हो,
मुझको भी गिरना अब आये।
'दिन के अंधे' की ज़िन्दगी मे,
रात्री का प्रहर भी 'जगमगाए'।

तूने मुझको सब दिया, अब,
मैं भी खोना चाहता हूँ।
खुश नही हूँ मैं खुशी से,
मैं भी रोना चाहता हूँ।

- मनव

(I too want to cry!)

I humbly pray to you
deviate my path now.
Years I have served you
Break these shackles somehow.

Walking your way so long
Now, I am so out of fuel.
I am exhausted and fatigued
One wish I have, O' Cruel.

Just give me a moment of freedom
Just a moment of respite from wrath.
restless, for those amazing times
I have my eyes on the path.

Amongst your talisman of success
I now want freewill downward incline.
For the sun which rises on your set arc
I now want its golden decline.

I want my trial to fail
I want to learn to tumble.
In the life of blinded-by-day
I want the night to sparkle.

You gave me everything,
but now I too want to lose-dry.
I am no longer happy with happiness
I too want to cry.

-manav

1 comment:

vivek kr singh said...

WAH WAH.....KYA GAAN KIYA HAI MANAVA KI VIDAMBANA KA!!!
VIDAMBANA HI NAHIN APITU PRATIKRIYA MANAVA MAN KI..... KYA KAHA JAYE AISE KAVI KE BAARE MEIN....