Monday, August 27, 2012

मैं चलता हूँ

कमरे की जमीन पर पड़ी धुल को 
कर सिरहाने एडियाँ घसीट कर 
साफ़ फर्श पर गंदे पाव लिए चलता हूँ |

कोने में पड़े ढेर, पर खुली पड़ी 
उलटी चिथडी किताब के एकांत में
अतीत का शोर सुन चलता हूँ |

मेज पर सजी, रुकी घडी के 
चलते काँटों से बेसबर मैं 
दीवारी शीशे की पर्छाइ में चलता हूँ |

मैं चलता तो हूँ पर, हर चेहरे में
उस नूर की तलाश करता 
अपनी बेवफाई में जलता हूँ |

Wednesday, July 04, 2012

बिखरे कण

कुछ कहेंगे तो कहोगी 
कह दिया कितना है किसने
कर सको तो कर दो इतना 
रहने दो मेरे दिल को रिसने


नग्न मन की नस में देखो
लहू कैसा निर्भीक है 
जखम की पीड़ा बताती
निशाना कितना सटीक है

Tuesday, March 15, 2011

हमारा 'उफ' बोलना भी कत्ल हो गया

जबाँ हमारी की खता, इतनी भी थी क्या?
अपनी आँखों की वैह्शियत का नज़ारा तो देखिये | 
की उनसे, छूरियों  पे छूरियाँ चलाते हैं यूं आप
और हमारा 'उफ' बोलना भी कत्ल हो गया?

मरकर ही शायद सुकून लिखा मेरी कहानी में
दे दे कुछ ऐसा की निकल जाये हलक से ये जान |
होंठों से लब्ज सांप सा छोड़ते हैं यूँ आप
आज लाल खून में, ज़हर  का दख्ल हो गया |

मस्जिद नहीं जाता मैं अब, कुरान पढता तेरी दर पर
मांगता मन्नत जीने की तुमसे, सुन ले मेरे परवर |
अपनी साँसों से लकीरें मेरी, छेड़ते हैं यूँ आप
आज मेरा खुदा भी तेरी हमशक्ल हो गया |

Tuesday, March 01, 2011

आज तो बस आपकी आँखों को देखेंगे

आज अपने दिल के अनल पर
मलमल से तेरे बदन को सेंकेंगे |
फुरसत के दिन हैं, आज तो
बस आपकी आँखों को देखेंगे |

छुएंगे नहीं जरा सा, तनिक भी
भूरे होंठो के कम्पन्न को
कच्ची, हांथो की, उँगलियों से
तिनका तिनका समेटेंगे |
मरने के दिन हैं, आज तो
बस आपकी आँखों को देखेंगे |

सांप से हांथों का डसना,
धागे से बालों का सिकुरना
साँसों को आपकी, अपनी
इक्छुक साँसों से लपेटेंगे |
खोने के दिन हैं, आज तो
बस आपकी आँखों को देखेंगे |

Monday, February 04, 2008

बस आज की है ये रात बाकी

बस बाकीं हैं वो दो पल जो
पहले सोने से बचे हुये।
बस दो क्षण का श्पर्श सखी
गुथी उंगलियों मे रचे हुये।

आज पीठ फेर सो'गी जब
मै भोला बालक बन आऊंगा
तेरे मस्तक के तिल को छूकर
बस इतना सा कह जाऊंगा।

तुम कल जाओगी दूर बहुत,
पर दूर बहुत तुम कब से थी,
मै मानस था भूं का तत्पर
तुम उच्च कोटि सदा नभ से थी।

तेरे पांव को चादर मे ढक, मै
तुम्हे सहलाने से रुक जाऊंगा।
तुम्हे बाहों मे भर तो लेता
पर छूने से भी कतराऊंगा।

फिर ओर पलट मेरी तुम प्रिय
बंद नयन से मुझे निहारोगी हलका।
मै समझ यही सो जाऊंगा कि,
था प्रेम तुम्हारा मुझपर भी छलका।

-मनव

Tuesday, December 18, 2007

मौत भी खुशनसीबी सी लगेगी फिर।

ज़िन्दगी मे एक बार प्यार कर के देख,
मौत भी खुशनसीबी सी लगेगी फिर।
यार की जुदाई मे बेकरार हो के देख,
शानोशौकत भी गरीबी सी लगेगी फिर।

एक बार दिल को धड़क जाने दे जरा,
एक बार आंखों को बहक जाने दे जरा।
के एक बार तू भी, बीमार हो के देख,
शक्ल खुद की अजनबी, सी लगेगी फिर।
ज़िन्दगी मे एक बार प्यार कर के देख,
मौत भी खुशनसीबी सी लगेगी फिर।

पतंग की डोर बन, हवा मे लहक के आ,
इस नशे के जाम मे, जरा चहक के आ।
मोहब्बत एक बार बेशुमार कर के देख,
ये दुनियां बहुत महज़बी, सी लगेगी फिर।
ज़िन्दगी मे एक बार प्यार कर के देख,
मौत भी खुशनसीबी सी लगेगी फिर।

सपने देख ले अब तूभी बहार मे,
अंग अंग रिसने दे प्यार के घुबार मे।
एक बार बेपनाह लाचार होके देख,
ये रोशनी भी बेहोशी, सी लगेगी फिर।
ज़िन्दगी मे एक बार प्यार कर के देख,
मौत भी खुशनसीबी सी लगेगी फिर।

-मनव

Friday, October 26, 2007

कत्ल किया तुमने, हाथों को फ़िरा के।

नज़र किस डगर पे, ये ऐसे चली है,
कि ढूंढें है तुमको, भी आंखें चुरा के।
ये आलसाया मै हूँ या तुम हुई ओझल,
कि कत्ल किया तुमने, हाथों को फ़िरा के।

ये ज़ख्म बदनसीबी, इश्क का गहरा।
ये गुलामी का आलम, बेहोशी का बहाना।
कि कैसे बताऊ ये दवा ही ज़हर है,
ये हुस्न-ए-निगेबां का, छोटा सा फसाना।

माहौल-ए-मौहब्बत, है या है तनहाई,
कि मुज़रिम को बरी करने के तरीके।
खवाहिश आखिरी इतनी सी रहेगी
कि दुनिया को दिखें ये जुल्मी सलीके।

जागती आँखों को सपने ने फंसाया,
अंधा किया तुमने पलकों को गिरा के।
तमन्ना लिये अब फिर बेसुध पडा हूँ,
कि कत्ल करो मेरा, फिर हांथों को फ़िरा के।

Monday, October 08, 2007

ये पहेली ही, मेरी ज़िन्दगानी है।

क्या चीज़ है ये दिल भी दिलबर
कि आज लिया, कल लौटा दे।
निशां प्यार का, होता रेत नही,
कि आकर पानी, बल मिटा दे।

दो सदियों से हांथों मे मेरे
हाथ किसी का अमानत है।
अब बैठा हूँ खुदगर्ज़ी मे, देखें
आती कब तक, ये कयामत है?

अल्फ़ाज़ों की रहकर छाया मे,
आगाज़ मौन को देता हूँ।
तुझे पाकर तो, मै मर जाता,
तुझे खोकर ही, अब जी लेता हूँ।

तुम मेरी ना, हूँ मै तेरा,
ये पहेली ही, मेरी ज़िन्दगानी है।
तुम जिसकी होकर साथ मेरे,
उसके ख्वाबों की ये कहानी है।

Thursday, August 23, 2007

बहने इसी के कम से कम

जो पड़ी, नजरअंदाज तुम
क्यो मुझे करती हो?
कुछ सुनना मुझसे कि
बोलने से ख़ुद डरती हो?

क्यो मौन का श्रृंगार कर
बातो से मुह मोडा है?
ये आदि का ग़ुस्सा है कि
नखरा आज का थोड़ा है?

चलो हवाओं कि उंगली पकड़
बातें कुछ हैं करते
उस झीने के तल जाकर
थोड़ा वहाँ ठहरते

और ये भी मंजूर नही तो
क्या मुस्काना भी ना आएगा?
बहने इसी के कम से कम
ये मुआ दिन बीत जायेगा

-मनव
२३ अगस्त २००७

Monday, August 20, 2007

मेरे पल भर का सपना टूटा।

क्यों नहीं अब आती मुझको
वो चंचल मन की फरियादें?
होंठ नही खुलते क्यो मेरे?
मुझको कोई ये समझा दे।


भी क्यों हांथों के सहलाने
पर स्पर्श मौन सा रहता?
होठों के क्र्नदन पर भी
अंतर मन कुछ ना कहता।


क्यो जड़ सी इस काया को
पत्थर ही अब लगते प्यारे?
चेहरे मे अपनो के भी
अब परदेसी मिलते सारे।


वो प्रेम भरा आंचल क्यों अब
नकाबों की याद दिलाता है?
बोल वो मीठे से दो
विष की फुंकार सा आता है।


ये किया हुआ सारा तेरा
फिर क्यों मै अपने से रूठा?
मै हैरां हूँ इस मंज़र पे
मेरे पल भर का सपना टूटा।


-मनव
(१४ अगस्त ’०७)

अब मेरे पीछे ना आना।

क्यों ज़बां-गवाही की फरियाद?
क्यों आंखें ना अब कोई पढ़ता है?
प्यार मुझसे तुमको है कितना?
अब ये पूछना क्यो पड़ता है?


क्यों हंसने पर भर संका से
सवालात किये जाते हैं फिर?
क्यो कहने पर कि "कैसी हो?"
अधर तुम्हारे हो जाते हैं स्थिर?


मेरे दिल की हर धड़कन पर
क्यों पूछा ये नाम है किसका?
क्यो घाव पर मुस्का कर नोचा
बह रहा लहू लाल है जिसका?


क्यो मेरे अनुराग को तुमने
जांचा बना के लेना-देना?
देख लिया मैने सब कुछ अब
चाह्ता हूँ आंखे बंद कर लेना।


मै अब थोड़ा सा अकेले
चाहता हूँ पैदल जाना।
वो रस्ते जो कुछ भी होंगे
अब मेरे पीछे ना आना।


-मनव
(२० अगस्त २००७)

विदा कहूँ तो भी कैसे

आखीरी, तल मे पड़ी, गीली
बूंदें दो-चार, पी लेने दो।
क्षण-भंगुर इस सपने के
पल अंतिम को, जी लेने दो।

महकने दो उन फूलों को
पल मे जो मुरझाने वालें हैं।
छूने दो शाखाओं को, पर जिस
ये खिलते मतवाले हैं।

रौंदो अब उस घरोंदे को
जिससे हम खेले ही नही।
साथ जिसे हमने खीचां वो
अब लगते अकेले ही सही।

आओ उस छोटी चिडिया के
काट परों को हम देते है।
वो चल ना सके, खातिर उसके
उखाड़, पैरों को हम देते हैं।

अब दोराहे पर चलना साथ
हम-तुमको भाता ही नही।
विदा कहूँ तो भी कैसे, वो
कहना मुझको आता ही नही।

-मनव
(२० अगस्त २००७)

Friday, August 17, 2007

क्या दूरी ही अब उत्तर देगी?

तुम क्यों अब भी, एक रहस्य हो?
क्यो हो अब भी तुम, एक पहेली?
क्यों कभी मस्तक पर रेखा सी
क्यों कभी तितली सी अलबेली?

ज़ख्मों को कपड़ों से ढक कर
क्यों मजबूर हंसी को करती?
विस्मित से, उलझे से मन मे
रूप खुशी का, दुख क्यों धरती?

तुम क्यों अब भी, झुलसी सी हो?
क्यों अब भी ना तुम, मेरी सहेली?
क्यों अब भी तुम, भूत मे भटको?
क्यों मेरी बांहों, मे भी अकेली?

प्रेम का धागा बीच हमारे
बंधन से क्यों है घबराता?
हीरे मोती बेदाग पड़े है, फिर
पिरा-हार क्यों बन नही पाता?

हूँ मै क्या सूनेपन का सहारा?
धडकन अब सूई सी है नुकेली।
क्या दूरी ही अब उत्तर देगी, जो
शपथ तुमने ’बोलते’-मौन की ले ली।
क्यों कभी मस्तक पर रेखा सी
क्यों कभी तितली सी अलबेली?

-मनव (१७ अगस्त २००७)

तुम सजना, फिर भी ना आये।

आंखों से तेरा हांथ हटा कर
कुछ कहने को, मैने लब थे हिलाये।
दो बातें कहनी थी तुमसे, और
तुम तीजे की रट थे लगाये।
बीते सावन कितने सारे,
तुम सजना, फिर भी ना आये।

जाने से पहले का वादा
भूं पर मिटने की मर्यादा।
वादा की संदेशे पर
दो आंसू भी निकले ना पाये।
संदेशे आये, आंसू लाये।
तुम सजना, फिर भी ना आये।

चूड़ी का तोहफा चमकीला
चुनरी का जो रंग था पीला।
झुमके की झन-झन पर तुमने
प्रेम भरे जो गीत सुनाये।
टूटी चूड़ी, अब हाथों मे ना समाये।
तुम सजना, फिर भी ना आये।

मेरे होंठों की प्यास अधूरी
तेरे बिना मै कहां हूँ पूरी?
लिये बिना मुझको तुम कैसे
अपने अंत-सफर जा पाये?
तेरी अग्नी, मेरी भी बन जाये
तुम सजना, फिर भी ना आये।

-मनव (१८ अगस्त २००७)

Sunday, August 12, 2007

इतना सा बस कहता हूँ

देखो इतना सा कहता हूँ
कस कर दरवाज़े बन्द कर लेना।
दिल को ताले मे रखना और
धड़कन धीरे, चंद कर लेना।

धीरे से, सांसों से कहना
कम कर दें कुछ आना जाना।
झपकें ना ये पलक नयन की
आंखों को इतना समझाना।

कहना होंठों की लाली से
होली तक, बस ये रुक जायें।
कानो की बाली मे लिपटे
मोती को ना अब झलकायें।

बालों से भी कह देना कि
ठीक नही खुल कर रहना।
बेसब्र ना हो ये पल पल मे
अंगड़ाई अपनी से कहना।

इतना सा बस कहता हूँ
बाकी ना हम बतलाएगें।
सुन लो मेरी फ़रियादें वर्ना
कितने दीवाने लुट जायेंगें।

-मनव (13th Aug '07)

Saturday, August 11, 2007

ये दस दिन कितने भारीं हैं।

हँसने पर भी जो आ जाते
आंसू भी कितने व्यापारी हैं।
आज, बिना नम हो कर रोता
ये दस दिन कितने भारीं हैं।

यादों मे खोना और कहना
कि अब जीना दुशवारी है।
कहता सीने मे जलता दिल
ये दस दिन कितने भारीं हैं।

मै करवट जब भी लेता हूँ
तेरी, कानो मे गूँजे किलकारी है।
तुझे ना पाकर मै सहमा सा
ये दस दिन कितने भारीं हैं।

स्पर्श तेरा, झगडे - बातें
याद मुझे वो सारीं हैं।
अपर्याप्त तेरे लिये मै, पर
ये दस दिन कितने भारी हैं।

ये घड़ी भी जुल्मी, है रुक जाती
अब और दूरी ना गवारी है।
मै वक्त देख, काटूं वक्त को
ये दस दिन कितने भारीं हैं।

तेरे आने की बात नही
तेरी याद ही बन गयी महामारी है।
मै नित जी कर फिर मरता हूँ
ये दस दिन कितने भारीं हैं।

-मनव (Aug 11th '07)

Friday, August 10, 2007

आने की विनती ना करता

पहरे मे पलों के, मै चुप
परछाई से अपनी कतराता।
बारिश मे, लब सख़्तों से,
तुमसे बस इतना कह पाता।

कह पाता की नींद अधूरी
अधूरा ये मेरा है सपना।
कमरे की खाली दीवारों
पर दिखता कोई है अपना।

कहना था कि - बड़ी टीस है
लगता मुझको, जब दरवाज़े चर्राते।
वो परदे का हलके से हिलना
काश मध्य से तुम आ जाते।

फ़नफ़नाती बयार मे पल-पल
अब भी तेरी हंसी व्याप्त है।
आ जाने का किया जो वादा
लगता नही वो अब पर्याप्त है।

बस इतना सा कहना, तुम बिन
सूना ये, कब से गलियारा।
आने की विनती ना करता, ’गर
संग ले जाती ये दिल बेचारा।

-मनव (Aug 10th '07)

Wednesday, August 01, 2007

क्यों दिवाना बनाया?

तेरे केशों का धागा, बिस्तर पर मेरे
रातों की कहानी, बयां कर रहा है।
कुछ सपने बने थे, या तुम आई थी?
तकिये की सिलवट पुरानी, नया कर रहा है।

बुदबुदाती झिल्ली सी कमसिन, होंठों की मधुरता
सुनता अब भी मै अकसार, कानों मे अपने।
मैने देखा तुम्हे या, परछाई छिपी थी?
पागल मुझसे ही लगते, दिवानों के सपने।

छोटे से कमरे की चारों, दिवारें है गूंजे
उससे, तुमने कहा, मुझसे जो कल था।
दर्पण भी सोचे, वो सच था या झूठा?
झूठा ही सही पर, अनोखा वो पल था।

मै उठ कर हूँ बैठूं जैसे हांथों को तेरे
देह पर मेरे सरकती, तुम्हारी है काया।
ये उगती सुबह की फ़िज़ा भी परेशां।
दिवाने मन को, क्यों फिरसे दिवाना बनाया।

-मनव (28th July '07)

सामने बैठ कर

सामने बैठ कर, एक टक जो देखती हो
इन सांसों के स्पंदन मे भी मौन सा है।
यूँ हंसने से पहले, निगाहें झुकाना
कहो ये निशाना, अभी, कौन सा है?

बांहें पकड़ कर उनहें, उफ़ झटकना
ज़हर के बिना भी मारना जानती हो।
मस्तक की रेखा का नित यूं बदलना
खुद को खुदा क्या, शोखियों का मानती हो?

होंठों के सहारे, बदन नापना जो
नशा अंगडाई का, अब परेशां क्या बताये?
चादर के रेशों सी पकड़ उंगलियों को
बतौरे निशनी क्या गला वो दिखाये?

उंगलियां फिरती, पीठ पर चीटियों सी
नाखुनो की कुरद मे, ये कैसी कसक है?
जकड़ उन करों की, बेलों सी चिपटे
केशों के धुंये मे क्यों कस्तूरी महक है?

सुस्ताती आँखों मे, पुंज रौशनी का
पलकों के किनारे, सितारों की लता है।
मेरे हांथो मे बैठा, पलता एक चेहरा
चंचल सी तितली, का वो पता है।

-मनव (24th July '07)

Tuesday, July 31, 2007

क्यों प्यार करता हूँ तुम्हे मै

क्यों प्यार करता हूँ तुम्हे मै,
मै ढूंढता उसके बहाने।
मेरे सुर मे जो शब्द डाले
मै खोजता ऐसे तराने।

सीप सी आँखों के तल मे,
मोती नित क्यो पल रहा है?
परे पंखुड़ियों की लहर के
नीचे क्या क्या चल रहा है?

वर्क सोने का पहन कर
मुझको ऐसे ना रिझाओ।
पर्दे जिसमे एक ना हों
वो रूप वासत्विक दिखाओ।

स्वप्न देखा जो गोधुली मे
उसकी क्या तुम ईक स्मृति हो?
या, धुंध भरी, माया ही हो तुम,
कैसी विस्मयी तुम कृति हो?

-मनव